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आर्टिकल 15, समाज को आईना दिखाने वाली फिल्म

आर्टिकल 15 जैसी फिल्मों की ज़रूरत

अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित आर्टिकल 15 फिल्म का विरोध किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसका विरोध करने वाले समाज में कोई बदलाव लाना या दिखाना नहीं चाहते। संविधान, क़ानून और स्कूली किताबों में मात्र पढ़ लेने से समानता का अधिकार नहीं मिल सकता। यह एक कड़वा सच है जिसे हर कोई जानता है।

मुट्ठी भर तथाकथित समाज का ऊँचा वर्ग, एक जनसमूह को दबाकर रखना चाहता है। हैरानी की बात ये है कि ऐसा करने में पुलिस और प्रशासन भी उनकी मदद करता है। समाज में उनकी न कोई मांग मानता है और न न्याय दिलाता है।

फिल्म के माध्यम से सन्देश

आर्टिकल 15, असली तथ्यों का फ़िल्मी रूपांतरण कर दर्शकों के सामने रखता है। जिसे देखने के बाद हर किसी के अंदर एक बेचैनी महसूस होती है। जिसका निवारण न हो तो हमारी ज़िन्दगी बदत्तर हो जायेगी। क्योंकि, हमारे दैनिक कार्यो से उत्पन्न गन्दगी की सफाई वही करते हैं। अगर एक दिन ये काम रुक जाए तो ज़िन्दगी रुक जाती है। सभ्य और स्वस्थ समाज के निर्माण में हर किसी की भूमिका महत्वपूर्ण है, जिसे नज़रंदाज़ नहीं कर सकते।

फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी को वैसे तो काल्पनिकता का जामा पहनाया गया है। क्योंकि सच्चाई इतनी कड़वी है कि उसे कल्पना का शहद लगाकर ही चखा जा सकता है। कहानी दलित वर्ग के लोगो की है। जो कानून से अपनी बेटियों के सामूहिक बलात्कार और हत्या के लिए इंसाफ चाहता है। ऐसा होने का कारण भी भयावह है, मात्र 3 रूपये मज़दूरी बढ़ाने की मांग के बदले उनके साथ ऐसी वारदात को अंजाम दिया जाता है। बाद में पुलिस किस तरह से हत्या और बलात्कार को ऑनर किलिंग में बदलकर, लड़कियों के पिता को ही जेल भिजवा देती है।

कदम दर कदम सच्चाई को झुठलाने की कोशिश जारी रहती है। सिस्टम को इतना बेईमान बना दिया गया है की एक ईमानदार अफसर भी धोखा खा जाता है। आयुष्मान खुर्राना इस केस को सॉल्व करते हुए, कई बार अपने ही लोगो के कोप का शिकार बनते है। जो उनके साथी, सहयोगी अफसर है वही लोग इस कुकर्म में लिप्त है।

फिल्म में कई और उप कहानियाँ मौजूद है जो समाज में व्याप्त दुर्दशा को दिखाता है। राजनीती, नेता, सीबीआई, मेडिकल, डॉक्टर, इंजीनियर, बड़े अफसर सभी भ्रष्ठ है। ऐसे में न्याय की उम्मीद करना ही सबसे बड़ी गलती है।

हर फिल्म की कहानी की तरह इस फिल्म की कहानी भी अंत तक सबकुछ सही कर देती है। साथ ही एक सन्देश भी मिलता है सबके साथ मिलकर चलने में ही भलाई है।

इस फिल्म की कहानी में कल्पना और सच्चाई को बहुत ही बारीकी से मिश्रित किया गया है। जो काल्पनिक होते हुए भी हमें सच का एहसास कराता है।

हर पात्र का दोहरा चरित्र

सिवाय फिल्म के नायक और निम्न वर्ग के, हर किसी का दोहरा चरित्र दिखाया गया है। जो आज की वास्तविकता है। नेता जनता के समक्ष उनका हमदर्द बनकर जनमत हासिल करके उन्हें ही दर्द देता है। पुलिस अफसर खुद आरोपी है और बचने के लिए वो घटना की जांच का रुख मोड़ता है। डॉक्टर पैसे खाकर या डर से पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बदलता है। फिल्म का हर पात्र और उनका अभिनय तारीफ के काबिल है।

निर्देशन, सिनेमाटोग्राफी, संपादन और संगीत।

फिल्म के निर्देशक अनुभव सिन्हा ने एक ऐसे विषय को चुना, जिसके बारे में कोई बात भी नहीं करना चाहता। उनकी जीत तो यही पर हो जाती है। उसके बाद अपनी दक्ष लेखन, कल्पनाशक्ति के दम पर ऐसी कहानी लिखना सोने पे सुहागा।

संवाद भी ऐसे जो चुभे और गुदगुदाए। फिल्म की बढ़िया और प्रभावी सिनेमाटोग्राफी फिल्म के दृश्य को शानदार बनाती है। फिल्म के कई ऐसे दृश्य आपको झकझोर देंगे। फिल्म का पाश्र्व संगीत आपको जकड़ कर रखता है। फिल्म का संपादन आपको फिल्म खत्म होने तक बांधे रखता है। फिल्म को रीयलिस्टिक रखते हुए उसे थ्रिलर अंदाज़ में पेश करना, दर्शकों का दिल जीत लेता है।

कुल मिलाकर आर्टिकल 15 एक ऐसी फिल्म है जिसे आपको जरूर देखना चाहिए।

फिल्म समाज का आइना है

फिल्म कभी समाज से तो कभी समाज फिल्म से प्रेरित हो जाता है। कुछ फैशन हम फिल्म की देखा देखी अपने जीवन में ढाल लेते है। कभी असल ज़िन्दगी की घटना, किसी की कहानी फिल्म के लिए प्रेरणा स्रोत बनती है। इसलिए फिल्म को समाज का आइना कहते है।

आईना चाहे कितना भी कीमती हो वो सच्चाई दिखाने में पीछे नहीं हटता। अब ये उसपर निर्भर करता है कि वो उस आईने को देखना चाहता है या तोड़ना। पर उससे सच्चाई नहीं बदलेगी। इसलिए आर्टिकल 15 जैसी और भी फ़िल्में बननी चाहिए। जो समाज की एक सही तस्वीर दिखाने के साथ बदलाव लाने के लिए प्रेरित भी करे। धन्यवाद।

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Shyam Shah

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