0

जहाँ मतलब हो वहां दोस्ती नहीं होती – श्री कृष्णा (Happy Friendship Day)

सच्ची दोस्ती में ‘मतलब’ की जगह नहीं होती

Happy friendship Day

एक बार सुदामा ने कृष्णा जी से पूछा की दोस्ती का असली मतलब क्या होता है? इस पर हँसते हुए श्री कृष्णा ने कहाँ जहाँ मतलब हो वहां दोस्ती कहाँ होती हैं। श्री कृष्णा और सुदामा की मित्रता भारतीय धर्म और संस्कृति में एक अनूठी मिसाल मानी गई हैं।

अगर हम इनकी मित्रता पर गौर करें तो पाएंगे, सच्ची दोस्ती कुछ नहीं देखती, वो तो सिर्फ दोस्ती और उस दोस्ती को आजीवन निभाने की वचन देखती हैं। श्री कृष्णा भगवान् और सुदामा एक बेहद गरीब ब्राम्हण थे, दोनों सहपाठी थे, तभी से दोनों पक्के दोस्त रहें।

दोस्ती हो तो कृष्णा और सुदामा के जैसी

कहते हैं अगर कसी ने भी भगवान श्री कृष्णा को अपना मित्र समझ लिया तो फिर उसे जीवन में कभी कोई दुःख नहीं रह जाता। क्योंकि श्री कृष्णा उसके सारे दुःख हर लेते हैं। क्या खूब श्री कृष्णा ने दोस्ती निभाई जब उनके 4 मुट्ठी चावल के बदले उन्हें राजमहल बनवाकर दिया।

कहानी कुछ इस तरह हैं की सुदामा और कृष्णा अब अपने अपने नगरी रहते थे, दोनों एक दुसरे से मिलने को व्याकुल रहते थे। एक दिन गरीबी और भूख से तड़पते बच्चों को देखकर, सुदामा की पत्नी ने कहाँ, की वो जाकर अपने मित्र श्री कृष्णा से मदद मांगे। अपने पत्नी के कहने पर, वो मित्र श्री कृष्णा से मिलने द्वारका गए, 4 मुट्ठी चावल लेकर उपहार स्वरुप।

दोस्ती पर सुनिए कुछ यादगार पंक्तियाँ 

जब कृष्णा जी को सुदामा के आने की खबर मिली वो नंगे पाँव भागते हुए उनके पास पहुचे, गले से लगाया और पूछा तुम इतने दिन कहाँ थे, क्यों मिलने नहीं आये? श्री कृष्णा अपने मित्र सुदामा के पैर खुद साफ़ करते हैं, उनकी आँखों से आंसू की धारा बहने लगती हैं।

श्री कृष्णा ख़ुशी ख़ुशी चावल ग्रहण करते हैं। सुदामा जब घर लौटते हैं तो वे सोचते हैं की वो अपनी पत्नी से क्या कहेंगे की कृष्णा ने क्या दिया? लेकिन जब वो घर पहुचंते हैं तो उन्हे अपनी पत्नी और बच्चे अच्छे वस्त्र और राजमहल में नज़र आते हैं। ऐसी होती हैं मित्रता जहाँ एक दोस्त के मांगने से पहले अगला दोस्त उसकी मांग पूरी कर देता हैं। कृष्णा जी ने सुदामा की गरीबी दूर कर उन्हे धनवान बना दिया।

सच्ची मित्रता का अर्थ है मित्र की हर हाल में सहायता करना

सुदामा कृष्णा को अपना भगवान् मानते हैं और कृष्णा उन्हें अपना परम मित्र। भगवान् और भक्त दोस्त की ऐसी मिसाल कहीं और नहीं मिलती। खुशियों में तो सब साथ देते हैं, पर असली दोस्त वो हैं जो दुःख में साथ न छोड़े, जैसे: कृष्णा-सुदामा

उनकी दोस्ती हमें यह सिखाती हैं की जब भी किसी से दोस्ती करों तो हर हाल में दोस्ती निभाओ। दोस्त अगर संकट में हो तो उसका साथ कभी न छोडो। सच्ची दोस्ती कभी भेद-भाव नहीं देखती, वो तो सिर्फ मन देखती हैं। जीवन में कितने मित्र हैं यह ज़रूरी नहीं, हम मित्र के लिए क्या कर सकते हैं, यह ज़रूरी हैं।

असली दोस्ती कहने में नहीं करने में हैं। उनकी दोस्ती की ये कहानी युगों युगों तक याद की जाएगी, क्योंकि इसमें मित्र और मित्रता के गूढ़ रहस्य छूपे हुए हैं।

ये भी पढ़े – ज़िन्दगी जीने का सही तरीका भौंरे से सीखिए

Did you enjoy this article?
Signup today and receive free updates straight in your inbox. We will never share or sell your email address.
I agree to have my personal information transfered to MailChimp ( more information )

Shyam Shah

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *