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मॉब लिंचिंग – अमानवीय, शर्मनाक और भीड़ का एक घिनौना रूप

मॉब लिंचिंग क्या हैं?

Stop Mob Lynching

लिंच क्या हैं? लिंच वो प्रक्रिया हैं, जिसमे कुछ लोग मिलकर एक व्यक्ति को किसी भी सजा के लिए दोषी मानते हैं, और उसे बिना किसी कानूनी मुक़दमे के पीट पीट कर मार डालते हैं। जब भीड़ कुछ लोगो से बढ़कर हज़ारों की संख्या में हो तो उसे मॉब लिंचिंग कहते हैं। आज की तारीख में हमारे भारत देश में मोब लिंचिंग की घटना बहुत बुरी तरह से बढ़ रही हैं।

कुछ हैरान करने वाली घटनाये  

पिछले कुछ महीनो में भारत के ११ राज्यों में करीब २७ ऐसी घटनाये हो चुकी हैं जिसमे भीड़ ने सिर्फ शक के साये में इन लोगो की जान ले ली।  मॉब लिचिंग की ये घटनाएं अगरतला, अहमदाबाद, रायपुर, माल्‍दा, औरंगाबाद, गुवाहाटी और हैदराबाद में हुई हैं।

अभी हाल ही में असम के कारबी आंग्लोंग जिले में एक बड़ी दुखद घटना हुई।  जहाँ भीड़ ने दो युवक निलोत्प्ल दास और अभिजीत नाथ को बच्चा चोर गिरोह का सदस्य समझकर मार डाला।  वो गुवाहाटी से घूमने गए थे वहां, भीड़ ने उनकी एक न सुनी, वो आग्रह करते रहे और लोग उन्हें बेरहमी से  पीटते रहें। अंत में उन दोनों की मृत्युं हो गई। 

महाराष्ट्र के धुले में करीब ५००० लोगो की भीड़ ने ५ लोगो को बच्चा चोर समझकर पीट पीट कर मार डाला, सभी मूक दर्शक बने देखते रहे, बचाव में आए ३ पुलिस को भी भीड़ ने घायल कर दिया।  सभी आदिवासी थे और भीख मांगकर अपना जीवन यापन करते थे।

झारखण्ड के रामगढ़ जिले में भीड़ ने एक सख्स को प्रतिबंधित मांस ले जाने के शक में पीट पीट कर मार डाला।

बिहार के रोहतास जिले में हिंसाई भीड़ ने दो सगे भाइयों को चोरी करने के शक में हत्या कर दी।  

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में  समाज के एक तबके ने, मानसिक रूप से बीमार और इलाज़ करा रही एक महिला की हत्या कर दी।  उन्हें शक था की वो बच्चा चोर है वो महिला अपनी बीमारी के कारण उन्हें समझा नहीं पा रही थी।  भीड़ ने उसे एक जीप से बांधकर तीन घंटे तक पिटाई की, जिससे उसकी मृत्युं हो गई।

कब रुकेंगी ऐसी अमानवीय घटनाये ? (आज के इस इंसान को ये क्या हो गया – Please Watch  )

इन सभी घटनाओ से एक बात साफ़ हैं की भीड़ तंत्र अब लोकतंत्र पर भरी पड़ रही हैं।  भीड़ तंत्र जिस तरह से अँधा इंसाफ कर रही हैं कानून को अपने हाथ में लेकर, उससे इंसानियत ही नहीं पूरा भारत विश्व मंच पर शर्मशार हैं।  अगर इसे रोका नहीं गया, दोषियों को सजा नहीं दिया गया तो, देश की जनता एक सदमे में, डर के माहौल में जीने को मज़बूर रहेगी।

आखिर भीड़ को क्या हक़ है की वो दोषी या बेगुनाह को या किसी को भी इस तरह से अमानवीय सजा दे।  ये ऐसी बर्बरता हैं जिससे लोगो के मानसिक अवसाद और इंसानियत के पतन होने का पता चलता हैं। देश में मॉब लिंचिंग को लेकर एक सख्त और कड़ा कानून लाने की सख्त ज़रूरत हैं।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले कुछ नए कानून लाने का फैसला किया हैं, जिसमे दोषियों को अधिकतम सजा फांसी और न्यूनतम सजा उम्रकैद रखी गई हैं।  अब ये राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी हैं की वो इस कानून को जल्दी अमल में लाये ताकि लोगो के दिल से दहशत कम हो सके। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश है, किसी भी तरह से अफवाहों को रोकने की व्यवस्था की जाए, इसके लिए उचित कानून बने एक सिस्टम बने, जिससे अफवाह को  फैलने से रोका जा सके।

आखिर क्यों हो रही हैं ऐसी घटनाये ?

ऐसी अमानवीय घटना जिससे समाज की एक शर्मनाक, अमानवीय और हिसात्मक  तस्वीर उभरकर सामने आ रही हैं। जिसे किसी भी हाल में एक सभ्य समाज नहीं कहा जा सकता , भीड़ का एक हिस्सा आपराधिक मानसिकता, क्रूरता और बर्बरता की और बढ़ रहा हैं, और एक बड़ा हिस्सा मूक दर्शक और तमाशबीन हैं जो घटनाओं को होते देखता हैं।  

वो इन घटनों की वीडियो रिकॉर्डिंग करता हैं, उसे फैलता हैं, लोगो को सूचित करता हैं, घटना होने के बाद उसकी निंदा करता हैं, पर सबकुछ होने के बाद।  समय रहते अगर भीड़ का एक बड़ा हिस्सा इसकी रोकथाम करता , तो इतनी अमानवीय घटना न घटती कभी। लोग किस कदर अमानवीय हो चुके हैं इसका पता इससे चलता हैं की सड़क पर घायल एक इंसान तड़प तड़प कर मर जाता हैं और भीड़ उसकी तस्वीर बनाती रहती हैं।  क्या हम तमाशबीन ही बने रहेंगे हमेशा?

ऐसा लगता हैं जैसे समाज की सोच आज़ाद नहीं हैं, वो किसी और के कहने पर काम करती हैं। कोई कुछ भी कह दे और उसे हम मान लेते हैं, इसके पीछे एक डर, असुरक्षा और हिंसात्मक प्रवृति काम करती हैं।  वही समाज का एक तबका ऐसी घटनाओं में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती है और लोगो के बीच अपना प्रभुत्व जमाती हैं, जैसे समाज को सुधारने का काम इन्ही होनहारों को सौंप दिया गया हैं।

एक समय था जब हम बापू, विवेकानंद, सरदार पटेल जैसे शख्सियतों को फॉलो करते थे।  आज हम किसी फॉलो करते हैं, सोचिये ज़रा ?

अफवाह और विचारहीन समाज – दोहरी मार   

fake news lead to mob lynching

आज हमारा समाज इस कदर डर के साये में जी रहा हैं की उसे पहले अपनी सुरक्षा की चिंता हैं, वो किसी तरह से पहले खुद को सुरक्षित रखना चाहता हैं, चाहे इसके लिए उसे किसी और की जान लेनी पड़ जाए।  उसके डर और असुरक्षा की भावना का इस्तेमाल गलत मनसूबे को अंजाम देने के लिए किया जाने लगा हैं।

आज का मीडिया तंत्र इस कदर लोगो के जीवन में और जेब में समा चुका हैं जहाँ, किसी घटना को प्रकाश में लाना बस एक शेयर बटन को दबाने से हो जाता हैं।  

आज सूचना क्रांति हमारे बहुत काम आ रही हैं, हमारा जीवन आसान हो गया हैं।  हम पल भर में कही भी पहुंच जाते हैं, किसी से भी मिल लेते हैं और अपना हाल समाचार सुनाते रहते हैं।  हम हर पल मीडिया के साथ हैं, ऐसे में मीडिया से हमारा नाता बहुत गहरा बन गया हैं। इस सूचना क्रांति के सहारे कइयों को इंसाफ मिला हैं लेकिन अब इसका इस्तेमाल एक षडयंत्र और साज़िश के तहत होने लगा है।

समाज पर अपनी पकड़ बनाने के लिए, लोगो को डराने के लिए अब ख़बरें बनाई जाने लगी हैं। झूठी ख़बरों को इस कदर फैलाया जाता हैं की लोग अपनी बुद्धि विवेक खो बैठते हैं।  ऐसी ख़बरें जिससे समाज में एक डर और दहशत का माहौल बने, उसका सहारा लिया जाता हैं। ख़बरें जो अफवाह होती है, जिसमे किसी बेक़सूर की ज़िन्दगी तबाह होती हैं।

किसी की भी तस्वीर लेकर, उसमे कुछ ऐसा लिख दिया जाता हैं की लोग उसे सच मान बैठते हैं।  कभी बच्चा चोर, कभी गोकशी, कभी रेपिस्ट तो कभी हत्यारा कहकर, मौत का फरमान लिख दिया जाता हैं।  बाकी का काम विचारहीन जनता कर देती हैं। उन्हें लगता हैं की इस खबर को वायरल करके वो समाज का कल्याण कर सकते हैं।  बेचारे अच्छाई के चक्कर में एक ऐसा गुनाह कर बैठते हैं, जिसका अंजाम होता हैं दर्दनाक मौत भीड़ के हाथों।

झूठी ख़बरों को फ़ैलाने के काम आता हैं सूचना तंत्र  के वो तमाम साधन, जो हमारे घर में हैं और हमारे जेब में ।  इसमें सिर्फ मीडिया को गलत नहीं कहा जा सकता, वो एक खबर प्रसारित करने का माध्यम हैं. मीडिया सिर्फ एक मशीन है वो सोच नहीं सकता, उसमे आप और हम जो खबर डालेंगे वो वही दिखायेगा।  सही और गलत की समझ इंसान के पास हैं, मशीन के पास नहीं।

इतना तो हम कर सकते हैं….

stop forwarding fake messages

अच्छी ख़बरों को कोई वायरल नहीं करता, उसमें किसी की रूचि नहीं होती।  वही एक बुरी खबर लोगो तक वायरस की तरह फैलने लगती हैं। वायरस हमेशा जानलेवा होता हैं चाहे वो आपकी हो या किसी और की।

ख़बरें कही से भी आ सकती हैं, उसे रोकना मुश्किल हैं, पर हम उसे आगे भेजने से तो रोक सकते हैं।  जो खबर संगीन लगे उसे अपने तक ही रखिये या उसे डिलीट कीजिये, पर आगे मत भेजिए, इससे किसी की जान भी जा सकती हैं।

हम सब यही चाहते हैं की समाज में लोग एक दूसरे के काम आए, एक दूसरे के साथ मिलकर रहे। अगर हम एक होकर रहेंगे और एक दूसरे पर भरोसा रखेंगे तो ही हम बच सकते हैं।  वरना, वो दिन दूर नहीं जब हमे अपने इंसान होने का परिचय पत्र भी साथ लेकर घूमना होगा।

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Shyam Shah

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