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मौन और मुस्कान के इस्तेमाल से, ज़िन्दगी बनेगी आसान

maun aur muskan

                   मौन और मुस्कान का सही प्रयोग कब और कैसे करें ?

समस्या चाहे कैसी भी हो, हम उस पर कैसी प्रतिक्रिया करते हैं? इससे हमारें जीवन में काफी फर्क पड़ता हैं।

मौन और मुस्कान का प्रयोग अगर सही समय पर किया जाये, तो ज़िन्दगी आसान बन जाती है । ये हमें तय करना है की कब हमारे लिए मौन रहना बेहतर है और कब  मुस्कुराना।

आखिर किस तरह से हम मौन और मुस्कान का इस्तेमाल अच्छी तरह से कर सकते है, आइये इसे समझते है ।

अगर मौन रहने से लड़ाई रुक सकती है तो मौन ही रहिये

कभी कभी हम ऐसे किसी बेकार बहस में पड़ जाते है, जहाँ से निकलना ही बेहतर होता है। ये बहस बढ़ते बढ़ते लड़ाई-झगडे में बदल जाती है। बहस करने वालें अपना और दुसरो का भी समय बर्बाद करते हैं। ऐसे बहस में पड़ने से तो मौन रहना ही सही है। न बहस न लड़ाई, समय का सदुपयोग कीजिये ।

मौन रहकर हम अपनी शक्ति को व्यर्थ होने से भी बचाते हैं। जहाँ बोलने से किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न हो, वहां तो मौन रहने में ही सबकी भलाई हैं। इसलिए तो कहते हैं सोच समझकर बोल या फिर मुंह न खोल।

मुस्कुराकर संघर्ष का सामना करने से शक्ति मिलती है

मुस्कुराकर हम कितनी सारी समस्याओं को आसानी से हल कर सकते हैं, मुस्कुराहट हमें समस्या से लड़ने की शक्ति देता हैं। मुस्कुराने से समस्या उतनी बड़ी नहीं लगती, समस्या का कद आधा हो जाता हैं और हम आधी जंग जीते लेते हैं। इसलिए मुस्कुराकर चुनौतियों का सामना कीजिये।

मुस्कान हमारे आत्मविश्वास और शांत मन का सूचक हैं। कठिन समस्या को देखकर भी वहीँ मुस्कुरा सकता हैं जो अन्दर से मजबूत हैं। वो जानता हैं की मुस्कुराने से मुश्किलें आसान लगती हैं, और जब मुश्किल आसान हो जाए तो फिर वो मुश्किल कहाँ? मुश्किलें भी उन्हें ही सताती हैं, उनकी परीक्षा लेती हैं जो मुश्किलों को  देखकर घबराते हैं, डर जाते हैं।

इसलिए मुश्किलों को देखकर, डरने की जगह बस मुस्कुराइए। अगर हमें जीवन जीने की कला आती हैं तो हम अपना पूरा जीवन शांति और सुकून से बिता सकते हैं। हम हर छोटी बड़ी समस्या का सामना शांति से कर सकते हैं।

जहाँ मौन रहने की ज़रूरत हैं वहां मौन रहिये और जहाँ मुस्कुराना हैं वहां मुस्कुराइए। यही सही जीवन जीने की कला हैं।

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Shyam Shah

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