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सीधी रेखा मुर्दों की होती हैं, जिंदा लोगों की नहीं

 

जीवन है तो संघर्ष और मुश्किलें भी होंगी, कुछ उतार और चढ़ाव भी होंगे। ज़िन्दगी की रेखा कभी सीधी नहीं होती। क्योंकि सीधी रेखा तो सिर्फ मुर्दों की होती हैं, जिंदा लोगो की नहीं। दिल का धड़कना अगर बंद हो जाए तो मौत हैं, दिल सिर्फ जिंदा दिल में धडकता हैं.

यहाँ पर हम ज़िन्दगी और मौत की तुलना संघर्ष करने और संघर्ष नहीं करने से कर रहे हैं। जिसके जीवन में कोई उतार चढ़ाव नहीं, कोई संघर्ष नहीं, कोई मुकाबला नहीं, कुछ नहीं। ऐसे लोगों की तुलना मुर्दों से की जाती हैं, सिर्फ सांस लेना ही ज़िन्दगी नहीं है। जिंदा रहने का मतलब बहुत कुछ हैं, सिर्फ खाना और सोना, यह तो जानवर भी करता हैं। इंसान और जानवर में क्या फर्क है फिर?

इंसान की ज़िन्दगी बनी ही हैं, संघर्ष का मुकाबला करने के लिए, उससे हार या जीतकर सबक सिखने के लिए। आगे बढ़ने के लिए संघर्ष और मुकाबला ज़रूरी हैं। कभी कामयाब होना, कभी शिकस्त होना, यही तो ज़िन्दगी हैं। इसी में तो जीने का मज़ा हैं, नहीं तो मुर्दों सी ज़िन्दगी हैं। जैसे मुर्दे को कोई फर्क नहीं पड़ता उसके साथ क्या हो रहा हैं। वैसा नहीं होना चाहिए, जिंदा है  तो जीने का सबूत हैं, उतार और चढ़ाव, कभी सुख कभी दुःख। ऐसी ही होती है ज़िन्दगी।

अगर जीवन में कुछ भी नया नहीं हो रहा हैं, कोई विकास नहीं, कोई मंजिल नहीं, जीने का कोई मकसद नहीं, तो ज़िन्दगी नाम की हैं। सीधी रेखा यानि मौत की लकीर। इस लकीर में अप्स एंड डाउन्स, हाई एंड लो का ग्राफ, जो प्रगति की निशानी हैं, होनी चाहिए। मुश्किलों का मुकाबला कीजिये, संघर्ष जारी रखिये, ज़िन्दगी का एक मकसद बनाइये। मौत से पहले सीधी रेखा बनाकर, खुद को मत मारिये।

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Shyam Shah

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